निष्काम भाव से की गई नर्मदा परिक्रमा जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि

कायस्थम ने किया नर्मदा परिक्रमा वासी श्रीवास्तव दंपत्ति का अभिनंदन
भोपाल।  कायस्थम मध्यप्रदेश द्वारा पुण्य सलिला मां नर्मदा की परिक्रमा से जुड़े आध्यात्मिक अनुभवों और उसके धार्मिक महत्व पर एक विशेष चर्चा का आयोजन किया गया। दुष्यंत संग्रहालय में आयोजित इस कार्यक्रम में मध्यप्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग के आयुक्त मनोज श्रीवास्तव, पूर्व मंत्री पी.सी. शर्मा, पूर्व आईएएस अधिकारी ओमप्रकाश श्रीवास्तव एवं उनकी धर्मपत्नी भारती श्रीवास्तव सहित अनेक विशिष्टजन उपस्थित रहे।

नर्मदा परिक्रमा पूर्ण कर चुके ओमप्रकाश श्रीवास्तव एवं भारती श्रीवास्तव ने अपने आध्यात्मिक अनुभव साझा किए। इस अवसर पर मुख्य वक्ता मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि नर्मदा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और अध्यात्म की जीवंत धारा है। उन्होंने नर्मदा को "भारत के शरीर पर धारण किए गए यज्ञोपवीत" की संज्ञा देते हुए कहा कि यह देश की सबसे विलक्षण नदी है, जिसकी उत्पत्ति शिव के स्वेद से मानी जाती है।

उन्होंने कहा कि नर्मदा परिक्रमा से प्राप्त आत्मज्ञान और जीवन-दर्शन का लाभ पूरे समाज तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने ओमप्रकाश और भारती श्रीवास्तव को अपने अनुभवों पर आधारित पुस्तक लिखने का सुझाव भी दिया, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस आध्यात्मिक धरोहर से परिचित हो सकें। पूर्व मंत्री पी.सी. शर्मा ने नर्मदा परिक्रमा पूर्ण करने पर श्रीवास्तव दंपति का अभिनंदन करते हुए कहा कि मां नर्मदा की परिक्रमा ईश्वर की सच्ची उपासना है और यह साधक को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाती है।

परिक्रमा अहंकार से मुक्ति और आत्मबोध का माध्यम

अपने अनुभव साझा करते हुए पूर्व आईएएस ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि नर्मदा परिक्रमा का मार्ग कठिन, जोखिमपूर्ण और धैर्य की परीक्षा लेने वाला होता है, लेकिन यही यात्रा जीवन का वास्तविक दर्शन कराती है। उन्होंने कहा कि निष्काम भाव से की गई नर्मदा परिक्रमा उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

उन्होंने कहा कि परिक्रमा मनुष्य को अहंकार से मुक्त करती है और यह समझाती है कि जीवन में अर्जित भौतिक वस्तुएं अंततः साथ नहीं जातीं। नर्मदा तट पर मिलने वाला सम्मान और आत्मिक संतोष किसी पद, प्रतिष्ठा या उपाधि से कहीं अधिक मूल्यवान होता है।

ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि नर्मदा तट पर बसे लोगों का निस्वार्थ सहयोग उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। उन्होंने बताया कि परिक्रमा के दौरान अनेक ऐसी घटनाएं घटित होती हैं, जो श्रद्धा और विश्वास को और अधिक दृढ़ करती हैं। उनके अनुसार नर्मदा परिक्रमा साधक को एक नई ऊर्जा प्रदान करती है और जीवन को भीतर से परिवर्तित कर देती है।

नर्मदा तट पर आज भी जीवित है सेवा और आस्था की परंपरा

भारती श्रीवास्तव ने नर्मदा नदी के पौराणिक इतिहास, उत्पत्ति और उससे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि मां नर्मदा की पहली परिक्रमा महर्षि मार्कण्डेय द्वारा की गई थी। उन्होंने कहा कि यदि परिक्रमा तट से तट तक की जाए, तभी नर्मदा के वास्तविक स्वरूप और आध्यात्मिक ऊर्जा को अनुभव किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि नर्मदा पथ पर स्थित आश्रमों और स्थानीय लोगों की सेवा भावना इतनी सशक्त है कि कोई भी यात्री भूखा नहीं रह सकता। परिक्रमा प्रारंभ करने से पहले नर्मदा पथ की संपूर्ण जानकारी होना भी आवश्यक है।

श्रीवास्तव दंपति का हुआ सम्मान

कार्यक्रम में नर्मदा परिक्रमा पूर्ण करने पर ओमप्रकाश श्रीवास्तव एवं भारती श्रीवास्तव को मनोज श्रीवास्तव तथा कायस्थम की ओर से अभिनंदन-पत्र एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। अभिनंदन-पत्र का वाचन आर.पी. श्रीवास्तव ने किया। कायस्थम के अध्यक्ष प्रलय श्रीवास्तव ने संस्था की गतिविधियों की जानकारी दी। इस अवसर पर मनोज श्रीवास्तव ने कायस्थम के वार्षिक कैलेंडर का विमोचन भी किया। कार्यक्रम के दौरान ओमप्रकाश श्रीवास्तव की नर्मदा परिक्रमा पर आधारित एक वृत्तचित्र का प्रदर्शन किया गया।




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