नारद जी कहिन…
संवाद, खबर और पत्रकारिता पर आधारित एक संपादकीय
— महेश दीक्षित
“नारायण… नारायण…”
जैसे ही यह आवाज सुनाई देती थी, देवताओं से लेकर दानवों तक सब सतर्क हो जाते थे। क्योंकि उन्हें पता होता था कि नारद जी कहीं न कहीं से कोई खबर लेकर आ रहे हैं। कोई राज खुलने वाला है, कोई संवाद होने वाला है या फिर कोई ऐसा सच सामने आने वाला है जिससे पूरा माहौल बदल जाएगा।
अगर आज के दौर में देखा जाए तो नारद जी को दुनिया का पहला संवाददाता, पहला राजनीतिक विश्लेषक और शायद पहला “मोबाइल पत्रकार” कहा जा सकता है। फर्क सिर्फ इतना था कि उनके पास कैमरा नहीं था, लेकिन खबरें ऐसी होती थीं कि तीनों लोकों में हलचल मच जाती थी।
आज के पत्रकार भी कुछ वैसे ही हैं।
वे भी सुबह से रात तक खबरों की तलाश में घूमते रहते हैं। फर्क बस इतना है कि पहले नारद जी वीणा लेकर चलते थे, अब पत्रकार माइक्रोफोन और मोबाइल लेकर घूमते हैं।
“नारद जी कहिन” — एक संपादकीय सोच
अगर किसी अखबार या न्यूज़ पोर्टल में “नारद जी कहिन” नाम से संपादकीय कॉलम शुरू हो जाए तो शायद वह सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला हिस्सा बन जाए। क्योंकि इस कॉलम में केवल खबर नहीं होगी, बल्कि खबर के पीछे की राजनीति, समाज और व्यवस्था का आईना भी होगा।
आज के दौर में खबरें बहुत हैं, लेकिन संवाद कम हो गए हैं।
हर कोई बोल रहा है, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं।
टीवी चैनलों पर बहस ज्यादा है, समझ कम है।
सोशल मीडिया पर शोर ज्यादा है, तथ्य कम हैं।
ऐसे समय में “नारद जी कहिन” जैसा कॉलम पत्रकारिता को फिर से संवाद की दिशा में ले जा सकता है।
नारद जी होते तो आज क्या करते?
अगर नारद जी आज धरती पर आते तो शायद सबसे पहले किसी न्यूज चैनल के बाहर खड़े होकर कहते —
“वत्स, इतना चिल्लाने से खबर बड़ी नहीं हो जाती।”
वे शायद नेताओं से भी सवाल करते कि जनता से ज्यादा कैमरे की चिंता क्यों हो रही है।
और पत्रकारों से पूछते कि खबर की खोज खत्म क्यों होती जा रही है?
क्योंकि आज पत्रकारिता में “ब्रेकिंग” की दौड़ ने “खोज” को पीछे धकेल दिया है।
पहले पत्रकार खबर खोजता था।
अब कई लोग केवल वायरल वीडियो खोजते हैं।
पहले संवाददाता गांव-गांव जाकर लोगों की समस्या सुनता था।
अब कई लोग एयर कंडीशन स्टूडियो में बैठकर जनता का दर्द समझने का दावा करते हैं।
खबर केवल सूचना नहीं होती
नारद जी केवल सूचना पहुंचाने का काम नहीं करते थे। वे संवाद करवाते थे।
कई बार उनके कारण विवाद भी होते थे, लेकिन उन विवादों से सच्चाई बाहर आती थी।
आज की पत्रकारिता का भी यही उद्देश्य होना चाहिए।
पत्रकार केवल “क्या हुआ” न बताए, बल्कि “क्यों हुआ” और “किसके कारण हुआ” यह भी सामने लाए।
लेकिन दुख की बात यह है कि आज कई जगह पत्रकारिता धीरे-धीरे प्रचार में बदलती जा रही है।
कुछ लोग खबर से ज्यादा एजेंडा चलाने में लगे हैं।
ऐसे समय में खोजी पत्रकारिता और संपादकीय लेखन की अहमियत और बढ़ जाती है।
पत्रकार घूम-घूमकर खबर क्यों निकालता है?
एक असली पत्रकार कभी कुर्सी पर बैठकर बड़ा नहीं बनता।
वह सड़क पर उतरता है, लोगों से मिलता है, चाय की दुकानों पर बैठता है, नेताओं के दफ्तरों के बाहर इंतजार करता है और कई बार घंटों मेहनत के बाद एक छोटी सी लाइन की खबर निकालता है।
लेकिन वही छोटी खबर कई बार सरकार हिला देती है।
पत्रकार जानता है कि खबर प्रेस नोट में नहीं, बल्कि लोगों की आंखों में छिपी होती है।
इसलिए वह घूमता है, सुनता है, समझता है और फिर लिखता है।
भोपाल की राजनीति हो, दिल्ली की सत्ता हो या गांव की पंचायत — हर जगह पत्रकार की नजर रहती है।
कई बार लोग मजाक में कहते हैं —
“पत्रकारों को सब पता होता है।”
असल में यह “सब पता होना” आसान नहीं होता।
इसके पीछे वर्षों का नेटवर्क, भरोसा और मेहनत होती है।
आज का पत्रकार और नारद जी
अगर तुलना करें तो आज का पत्रकार भी किसी आधुनिक नारद से कम नहीं है।
वह भी एक जगह से दूसरी जगह सूचना लेकर जाता है।
वह भी सत्ता और जनता के बीच संवाद बनाता है।
लेकिन फर्क यह है कि आज का पत्रकार कई दबावों के बीच काम करता है।
राजनीतिक दबाव।
आर्थिक दबाव।
सोशल मीडिया का दबाव।
टीआरपी और क्लिक का दबाव।
फिर भी कुछ पत्रकार आज भी ऐसे हैं जो सच की तलाश में लगे हुए हैं।
वे जानते हैं कि पत्रकारिता केवल नौकरी नहीं, जिम्मेदारी है।
संपादकीय कॉलम की ताकत
आजकल लोग लंबा पढ़ना कम पसंद करते हैं।
रील और शॉर्ट वीडियो के दौर में संपादकीय लेख धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि समाज की सोच बदलने का काम आज भी संपादकीय लेख ही करते हैं।
एक अच्छा संपादकीय केवल राय नहीं देता, वह सोचने पर मजबूर करता है।
“नारद जी कहिन” जैसा कॉलम समाज, राजनीति और मीडिया पर व्यंग्य के माध्यम से गंभीर बातें कह सकता है।
क्योंकि व्यंग्य वही हथियार है जो बिना शोर किए सबसे गहरी चोट करता है।
सोशल मीडिया का नारद युग
आज हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल है।
हर कोई वीडियो बना रहा है।
हर कोई अपनी राय दे रहा है।
एक तरह से देखा जाए तो आज का दौर “डिजिटल नारद युग” बन चुका है।
लेकिन समस्या यह है कि सूचना की गति बढ़ी है, विश्वसनीयता कम हुई है।
फर्जी खबरें तेजी से फैलती हैं।
अधूरी जानकारी को सच मान लिया जाता है।
और कई लोग बिना जांचे खबर आगे बढ़ा देते हैं।
ऐसे समय में जिम्मेदार पत्रकारिता की जरूरत पहले से ज्यादा है।
पत्रकारिता का असली धर्म
पत्रकार का काम केवल सत्ता की आलोचना करना नहीं है और न ही केवल तारीफ करना।
पत्रकार का असली धर्म है — सच को सामने लाना।
अगर सरकार अच्छा काम करे तो उसे दिखाना चाहिए।
अगर जनता परेशान हो तो उसकी आवाज उठानी चाहिए।
लेकिन आज समाज भी पत्रकार से बहुत उम्मीद करता है।
लोग चाहते हैं कि पत्रकार निडर हो, ईमानदार हो और सच बोले।
लेकिन जब वही सच उनके खिलाफ जाता है तो कई लोग नाराज भी हो जाते हैं।
यही पत्रकारिता की सबसे बड़ी विडंबना है।
नारायण… नारायण… खबर अभी बाकी है
अगर आज नारद जी किसी न्यूज़ रूम में पहुंच जाएं तो शायद मुस्कुराकर यही कहें —
“वत्स, खबर जल्दी दिखाने से ज्यादा जरूरी है सही दिखाना।”
वे शायद पत्रकारों को याद दिलाएं कि खबर का मतलब केवल सनसनी नहीं होता।
समाज को जागरूक करना भी पत्रकारिता का हिस्सा है।
और शायद वे यह भी कहें कि पत्रकारिता तब तक जिंदा रहेगी जब तक कुछ लोग सच की खोज में घूमते रहेंगे।
चाय की दुकानों से लेकर विधानसभा के गलियारों तक…
गांव की चौपाल से लेकर सोशल मीडिया तक…
जो लोग सच तलाश रहे हैं, वही असली पत्रकार हैं।
बाकी तो केवल शोर है।
और अंत में…
नारद जी अपनी वीणा उठाकर मुस्कुराते हुए शायद यही कहें —
“नारायण… नारायण…
खबर खत्म नहीं हुई है वत्स,
अभी समाज का संपादकीय बाकी है…”

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