आजकल पत्रकार होना कोई आसान काम नहीं - तलवार की नोक पर पत्रकार : महेश दीक्षित

 तलवार की नोक पर पत्रकार

— महेश दीक्षित की कलम से


आजकल पत्रकार होना कोई आसान काम नहीं है। पहले लोग कहते थे — “पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है।” अब हालात ऐसे हो गए हैं कि चौथा स्तंभ कम और चौतरफा संकट ज्यादा दिखाई देता है। पत्रकार सुबह घर से निकलता है तो परिवार ऐसे देखता है जैसे कोई जवान सीमा पर जा रहा हो। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां दुश्मन सामने होता है, यहां दुश्मन मुस्कुराते हुए चाय पिलाता है।

आज की पत्रकारिता में खबर लिखने से पहले खबर का वजन नहीं, बल्कि सामने वाले की पहुंच देखी जाती है। अगर किसी छोटे आदमी की समस्या लिख दो तो लोग कहते हैं — “वाह, जनता की आवाज उठा रहे हो।” लेकिन अगर किसी बड़े आदमी की सच्चाई लिख दी तो फोन आने लगते हैं — “भाई साहब, थोड़ा संभलकर… दुनिया बहुत खराब है।”

कुछ लोग तो ऐसे धमकाते हैं जैसे पत्रकार नहीं, उनकी निजी संपत्ति हो। कहते हैं — “देख लेंगे… पहचानते नहीं हो क्या?”
अब बेचारा पत्रकार सोचता है कि खबर लिखूं या पहले थाना और वकील का नंबर सेव करूं।

सबसे मजेदार बात यह है कि समाज चाहता है कि पत्रकार ईमानदार हो, निडर हो, सच लिखे, भ्रष्टाचार उजागर करे, जनता की आवाज बने… लेकिन जैसे ही खबर उनके अपने दरवाजे तक पहुंचती है, वही लोग कहते हैं — “अरे भाई, बात को यहीं खत्म करो।”

पत्रकार की जिंदगी भी बड़ी अजीब होती है।
घर में सिलेंडर खत्म हो जाए, बच्चों की फीस बाकी हो, जेब में पेट्रोल के पैसे न हों… फिर भी उसे कैमरा लेकर निकलना पड़ता है। क्योंकि शहर में कहीं नाली टूटी है, कहीं सड़क धंसी है, कहीं कोई अधिकारी सो रहा है और कहीं कोई नेता जनता को सपनों की नई किश्त बांट रहा है।

नेताओं की बात भी कम दिलचस्प नहीं होती। चुनाव के समय पत्रकार “भाई साहब” होता है। जीतने के बाद वही पत्रकार “आप लोग तो नकारात्मक खबर चलाते हैं” की श्रेणी में पहुंच जाता है।
कुछ नेता तो ऐसे भाव खाते हैं जैसे जनता ने नहीं, सीधे भगवान ने उन्हें विशेष पैकेज में धरती पर भेजा हो।

पत्रकार अगर सवाल पूछ दे तो कहा जाता है — “आप विपक्ष की भाषा बोल रहे हैं।”
अगर तारीफ कर दे तो कहा जाता है — “लगता है सेटिंग हो गई।”
मतलब पत्रकार चाहे जो करे, शक के घेरे में ही रहता है।

और सोशल मीडिया ने तो अलग ही अदालत लगा रखी है।
किसी खबर में एक शब्द गलत हो जाए तो लोग ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे देश की पूरी अर्थव्यवस्था उसी शब्द पर टिकी हो। लेकिन वही लोग फर्जी वीडियो और अफवाहें बिना जांचे आगे बढ़ाते रहते हैं।


आज का पत्रकार तलवार की नोक पर जी रहा है।
ना पूरी सुरक्षा, ना स्थायी आय, ना सम्मान की गारंटी।
फिर भी वह हर सुबह निकलता है क्योंकि उसे उम्मीद होती है कि शायद उसकी एक खबर किसी गरीब को न्याय दिला दे, किसी अधिकारी को जगा दे, या किसी नेता को जनता की याद दिला दे।

पत्रकारिता अब सिर्फ खबर लिखना नहीं रह गया, बल्कि रोज डर, दबाव, अभाव और आरोपों के बीच सच को बचाने की लड़ाई बन चुकी है।

फिर भी कुछ लोग कलम नहीं छोड़ते।
क्योंकि उन्हें पता है कि अगर सच लिखने वाले डर गए, तो झूठ बहुत तेजी से राज करेगा।

और अंत में पत्रकार बस इतना ही कहता है —
“जनाब, हम बिके नहीं हैं… बस अभी तक टिके हुए हैं।”

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